ज़िंदगी ढूंढ ही लेगी, फिर से नया बहाना जीने का।।
ज़िंदगी ढूंढ ही लेगी, फिर से नया बहाना जीने का,
ज़िंदगी ढूंढ ही लेगी, फिर से नया बहाना जीने का,
जो साथ है उसकी कदर नहीं, जो दूर है उसकी तलाश चल रही. जिसे बनाया था अपना कभी, अब उसमे वो बात नहीं दिख रहीं. और जो अभी हुआ ही नहीं अपना, उसमें अब सब खूबी दिख रही. वाह रे इंसान प्यार बोलते हो तुम इसको, मुझे तो बस ये जिस्मों और वक़्त की भूख…
याद है वो हमें कुछ इस तरह से अब तलक, उससे दूर होकर खुद को भूला बैठे हैं हम ।। निगाहों में नहीं वो अब दिल में कहीं बसता है, किस अजनबी को ये अपना बना बैठे हैं हम जिसे ये सोचकर चाहा कि खुशी मिलेगी हमें , उसके गम को अब सीने से लगा…
रात ढलते ही आज फिर से कलम उठा ली, कुछ लिखने के लिए सिरहाने मे रखी डायरी उठा ली, किस पर लिखू आज ये सोच ही रहा था ? ख्याल तो मन मे बहुत थे पर क्या लिखू बुझ नहीं रहा था। फिर अचानक अपनी डायरी-कलम को देखते ही, ख्याल एक आया साथी तुम अकेले…
कुछ अनकहीं बाते.. ना वो कलम लिख पाई.. ना वो लफ़्ज़ मिल पाए.. सुकून तेरी वो मुस्कान से ही मिलता है.. दर्द आज भी तुझसे दूर रहने मे उठता है.. पता है वो मेरे लिखे खत तुझे न ला सकेंगे पर यादो में तो तुझे ही बस तुझे ही बसा सके.. तेरी तसवीर ही है…
क्यु दर्द की बात करे, क्यु ज़ज्बात के घाव करे हरे. मिली थी जिन्दगी उसे मेरे आने से पहले. तो उसकी जिन्दगी भी क्यु बर्बाद करे?? हाँ एक पल नहीं हर पल के साथ की चाह थी, सुख और दुख मिलके बताने और बांटने की आश थी. नहीं हो सका अगर ये मुमकिन तो, क्यु…
सालो की जरूरत नही किसी के खास बनने मे , चंद लम्हे ही काफ़ी है किसी को समझने के लिऐ।। मुझे ना पता की क्या वजह की तुम अपने से लगे, सायद जिसे कह सकूं दर्द अपन वो हम दर्द लगे।। काश की मे भी लड़ आता अपनी क़िस्मत से, उन्हे समझा पाता अपने हिसाब से।। जरूरी…