रिश्तों की राख
गुम गए सब, जिन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर संभाला था,
तिनका-तिनका जोड़कर जो आशियाना बनाया था।
जितनी खुशी उसके बनने में मिली थी,
उससे कहीं ज़्यादा दर्द उसके उजड़ जाने में पाया।।
खामोश फिर उसी बंजर ज़मीन पर जा बैठा,
रिश्तों की राख तक ज़मीन पर छान डाली।
मिला न कोई निशान मेरे उजड़ जाने का,
शायद वक़्त ने उन्हें भी दफ़्न कर डाला।।
कह भी नहीं सकता कि छोड़ गए लोग,
बस खुद को यही समझाया—
लोग छोड़कर नहीं गए… बस गुम हो गए।
गुम हुए सब इस तरह कि हम भी सुन्न हो गए,
अपने कहने वाले दोस्त पल भर में खो गए।
सबने कहा, “भूलकर फिर से आगे बढ़ो”,
मगर हम हर बार बिखरकर फिर टूट गए।।
न जाने कितना पत्थरदिल समझते थे हमको,
इसलिए हर बार टूटने के लिए ही छोड़ गए।।
अब आँखें भी इंतज़ार में भीगती रहती हैं,
भोर हो या रात, बस नम-सी रहती हैं।
यादों का कारवाँ किसी समंदर से कम नहीं,
डूबा तो उसी में हूँ, मगर किनारा कहीं नहीं।।
न जाने मेरे सब्र का लोग क्यों इम्तिहान लेते हैं,
सब अपने ही थे, जो एक-एक कर चले गए।
इसलिए हर बार मुस्कुराकर बस इतना कह देता हूँ—
“चलो… खुश रहो तुम।”
और अपना दर्द ख़ामोशी में छुपा लेता हूँ।।
अब तो बदल लूँ खुद को,
ये कहाँ मुमकिन है।
बस हर रोज़ खुद का ही दोस्त बनकर,
अब खुद से ही बातें करता हूँ।।
कुछ लोग चले जाते हैं,
मगर उनकी यादें उम्रभर साथ चलती हैं।।— MySoloWord
