काश ये रात न होती
सब भूल जाऊँ तो जाऊँ कहाँ,
पलकों में छिपे इस दर्द को छुपाऊँ कहाँ।।
आँखों में आँसू
दिन भर छुपा लेता हूँ,
पर रात के सन्नाटों में
इस दर्द को भुलाऊँ कहाँ।।
काश ये रात न होती,
अपनों की यादें साथ न होती।
दिन तो गुज़र जाता है
खुद को मिटाकर,
काश रातों में भी
दिन जैसी कोई बात होती।।
यूँ हर जगह
खुद को भुलाकर,
कब तलक खुद को
झूठा दिलासा देता रहूँ।
ऐ आईने,
यूँ नज़रें मत फेर,
कब तक खुद से ही
मैं जी लूँगा, ये कहता रहूँ।।
मेरी हर आश
ना जाने क्यों
सिर्फ़ “काश” बनकर रह जाती है।
हर मोड़ पर ऐ ज़िंदगी,
तू मुझे ही क्यों आज़माती है।।
देखती है मुझे
गिरकर फिर संभलते हुए,
फिर भी हर बार
नज़र क्यों लगाती है।।
लोगों को मेरे क़रीब लाकर
सहारा तो देती है,
फिर ना जाने क्यों
उन्हीं से मुझे दूर कर देती है।।
शायद यही दस्तूर है
इस ज़िंदगी का,
जो अपना लगता है,
वही सबसे दूर हो जाता है।।
फिर भी हर सुबह
एक नई मुस्कान ओढ़ लेता हूँ,
क्योंकि टूटकर भी
जीना मुझे आता है।।
— MySoloWord
✍️ शब्द जो दिल से दिल तक
